सोमवार, 27 जून 2016

समोसा और जलेबी

हाँ  तो  मित्रों ,  पिछले  दिनों  असहिष्णुता  का  मुद्दा  जोरों  पर  था । अब  हम  ठहरे  स्वघोषित  व्यंग्यवादी  लेखक  हमने  सोचा  कि  इस  मुद्दे  पर  कुछ  लिखा  जाए । स्वयं  में  तो  बुद्धि  है  नहीं  हममें  कि  कुछ  लिख  पाएँ । हम  कभी  तो  किसी  कद्दू  से  बातचीत  लिख  देते  हैं  तो  कभी  किसी  मुर्गे  से  बातचीत  का  वर्णन  कर  देते  हैं । परंतु  असहिष्णुता  के  मुद्दे  पर  किसी  कद्दू  और  मुर्गे  से  भी  बात    कर  सकते  क्योंकि  ये  कमबख्त    तो  हिंदू  होते  हैं    ही  मुसलमान  तो  फिर  पकड़ें  किसे ।
आईडिया ! किसी  सार्वजनिक  स्थल  पर  चलते  हैं  जहाँ  हिंदू  और  मुसलमान  दोनों  मिलें । पर  यदि  हमने  सार्वजनिक  स्थल  हिंदू – मुस्लिम  सम्बंधी  कोई  मुद्दा  उठाया  और  वो  आपस  में  लड़  गए  तो  सबसे  पहले  गर्दन  तो  हमारी  पकड़ी  जाएगी  न । क्यों ? अरे ! भई  क्योंकि  हम  नेता    हैं  जो  दोनों  को  लड़ाकर  भी  अपना  लाभ  कर  लेता  है । हम  तो  मूर्ख  शिरोमणि  हैं ।
सार्वजनिक  स्थल  पर  जाने  से  तो  कोई  लाभ  मिल  नहीं  रहा  पर  इस  मुद्दे  पर  चर्चा  भी  हमें  करनी  है  फिर  क्या  करें ? हाँ  मिल  गया  मार्ग  ऐसा  करते  हैं  कि  किसी  ऐसी  दुकान  पर  जाते  हैं  जहाँ  पर  दोनों  आते  हों  और  वो  दुकान  वाला  बातूनी  हो । उसके  पास  दोनों  के  विचार  होंगे  वही  हमें  इस  मुद्दे  पर  जनराय  से  परिचित  कराएगा । पर  किसकी  दुकान  पर  जाएँ ? हाँ  किसी  बातूनी  नाई  की  दुकान  पर  चलते  हैं । पर  बाल  तो  हमारे  बढ़े  नहीं  हैं  और  दाढ़ी । ओहो !  पता  नहीं  दाढ़ी  सवेरे – सवेरे  काहे  बना  ली  हमने । अब  ये  बगल  के  बाल  तो  नाई  की  दुकान  पर  कटवाएँगे  नहीं । भई  हमें  तो  लज्जा  आएगी  अपनी  कमीज  चार  लोगों  के  सामने  उतारने  पर ।
फिर  किसके  पास  जाएँ ? हाँ  दर्जी  के  पास  चलते  हैं  वो  भी  बहुत  बातूनी  होते  हैं  और  कमीज  से  लेकर  पठानी  सूट  सब  सिलते  हैं । वो  अवश्य  हमारे  काम  के  होंगे । पर  दर्जी  के  पास  जाने  के  लिए  पहले  कपड़ा  खरीदना  होगा  और  उसके  बाद  दर्जी  को  सिलवाने  के  पैसे  भी  देने  होंगे  यानि  कि  हो  गया  हजार – बारह  सौ  का  खर्चा  बैठे – बिठाए । न  भैय्या  इतने  महँगे  में  तो  जनराय    जाननी  हमें । फिर  किसके  पास  जाएँ ? नाई  हो  गया , दर्जी  हो  गया  और  कौन , और  कौन ? हाँ  मिल  गया  चायवाला । किसी  चायवाले  के  पास  चलते  हैं ,चाय  तो  आदमी  प्रतिदिन  पी  सकता  है  और  प्रतिदिन  में  भी  कितनी  बार  भी  पी  सकता  है । न  कोई  रोक    कोई  टोक  ऊपर  से  वहाँ  दिन  भर  लोग  आते – जाते  रहते  हैं । उसे  इस  विषय  में  जनराय  का  अवश्य  पता  होगा ।
इस  समय  जाड़े  का  भी  समय  है । शरीर  की  ठण्डी  भी  कम   होगी  और  8 – 10  रूपए  में  हमें  जनराय  भी  पता  चल  जाएगी । अभी  निकालते  हैं  द्विचक्रवाहिनी  और  जाते  हैं  किसी  चाय  वाले  के  पास । पर  अभी  कैसे  जाएँ  रात  के  11  बजे  हैं । इस  समय  तो  मुझ  जैसे  कमसिन  आधे  सठियाए  हुए  की  इज्जत  खतरे  में  पड़  सकती  है । कोई  बात  नहीं  प्रात:काल  मे  चलेंगे ।
फिर  हम  निद्रा  के  आगोश  में  चले  गए । हालाँकि  उस  रात  हमारे  विचलित  मन  ने  निद्रा  देवी  को  बड़ा  सताया । पता  नहीं  इस  मन  का  भी  क्या  लोचा  है । जब  विचलित  होता  है  तो  निद्रा  देवी  के  लिए  डण्डा  लेकर  खड़ा  रहता  है । अंतत: कभी  सोते , कभी  जगते , कभी  ऊँघते  वो  रात  कट  ही  गई । प्रात:काल  5  बजे  हम  उठ  गए । हमने  सोचा  कि  अभी  जाने  का  क्या  लाभ  अभी  तो  दुकान पर  कोई  होगा  भी  नहीं । फिर  मस्तिष्क  में  विचार  आया  कि  हमें  दो – चार  ग्राहकों  का  करना  भी  क्या  है ? प्रतिदिन  सौ  ग्राहकों  से  मिलने  वाले  दुकानदार  से  ही  जनराय  जान  लेंगे । उठते  ही  हमने  शौचालय  की  सेवा  ली  और  बिना  नहाए , मुँह  धोए  अपनी  द्विचक्रवाहिनी  पर  चढ़े  और  चल  दिए  किसी  चायवाले  की  तलाश  में ।
थोड़ी  दूर  चलने  के  बाद  हमने  सड़क  पर  एक  दुकान  देखी – बंसी  टी  स्टॉल । लो  जी  बन  गया  काम । अब  तो  इसी  के  यहाँ  चाय  पिएँगे  और  जनराय  जानेंगे । सुबह  के  05:30  हुए  थे  और  दुकान  का  शटर  अभी  भी  बंद  था । हमने  जोर  से  शटर  पर  हाथ  मारा , शटर  नहीं  खुला । हमने  पुन:  शटर  पर  हाथ  मारा । अबकि  अंदर  से  ध्वनि  आई – ऐ ! दन्नू  जाकर  देख  कौन  पीट  रहा  है  शटर  इतनी  सुबह – सुबह ? कोई  कुत्ता  हो  तो  देना  घुमाकर  एक  गिट्टी ।
कुत्ता ? नहीं  हम  कुत्ते  तो  बिल्कुल  नहीं  हाँ  छोटे  हाथी  अवश्य  हैं । पर  दुकान , नहीं , नहीं  स्टॉल  मालिक  हमारे  छोटा  भीमकाय  शरीर  के  दर्शन  के  अभाव  में  हमें  कुत्ता  समझ  रहा  है । कहीं  दुकान  खोलते  ही  हम  पर  पत्थर    चला  दे । इसलिए  हम  बोले – अरे ! हम  पीट  रहे  हैं  शटर । हम  कुत्ते  नहीं  हैं    ही  हमें  पत्थर  खाना  है  बल्कि  चाय  पीनी  है ।
हमने  अपना  पत्थर  से  चोट  खाना  बचा  लिया  था । शटर  खुला  और  एक  14 – 15  वर्ष  का  किशोर  अँगड़ाई  लेते  हुए  बाहर  आया  और  बोला – तुम  हो  जिसे  सुबह  पौने  छ्ह  बजे  चाय  पीनी  है ?
हम  अपना  कॉलर  ऊपर  करते  हुए  बोले – हाँ  हम  ही  हैं  वो  वीर  पुरुष  जो  घर  से  2  किमी  दूर  सवेरे – सवेरे  चाय  पीने  आया  है ।
किशोर  ने  हमें  अंदर  आने  को  कहा  फिर  कंधे  पर  पड़े  अँगोछे  से  एक  कुर्सी – मेज  पोंछी  और  बैठने  को  कहा । तभी  एक  चुटियाधारी  लाल  अँगोछाधारी  कुर्ता – पायजामा  पहने  लगभग  45  वर्षीय  चंदला  व्यक्ति  आया  और  बोला – नमस्ते  सेठजी ! क्या  लेंगे  आप ?
हम  बोले – चाय  लेंगे  हम  तो । पर  कुछ  भूख  भी  लग  रही  है  कुछ  नाश्ते  को  भी  बना  दो ।
‌ उस  व्यक्ति  ने  उस  किशोर  से  कहा – दन्नू  जल्दी  से  रात  के  बर्तन  माँज  मैं  नहाकर  आता  हूँ ।
दन्नू  ने  कहा – बंसी  काका , अभी    धो  पाऊँगा  बर्तन । पहले  पखाना  जाना  है  अभी  तो  उठा  हूँ ।
बंसी  ने  कहा – अरे ! तो  पहले  उधर  ही  हो  आ । जो  काम  रूक  नहीं  सकता  वो  पहले  कर  ले ।
फिर  उस  व्यक्ति  यानि  कि  बंसी  ने  हमसे  कहा – सेठजी    का  है    हमारी  दुकान  सुबह  7  बजे  खुलती  है । इसलिए  अभी  सब  कुछ  अस्त – व्यस्त  है । ये  दन्नू  बस    जाए  फारिग  होकर  तो  मैं  फटाफट  चाय  बना  देता  हूँ । वैसे  आप  नाश्ते  में  क्या  लेंगे ?
हम  लगभग  एक  घण्टे  पूर्व  शौचालय  की  सेवा  ले  चुके  थे  इसलिए  उदर  में  हाथी  कूद  ही  रहे  थे । कुछ  खाना  तो  था  ही । हम  बोले – क्या – क्या  मिलेगा  नाश्ते  में ?
बंसी  बोला – बंसी  के  स्पेशल  समोसे , जिसे  खाकर  आप  ऊँगलियाँ  चाटते  रह  जाएँ  वो  जलेबी , इठलाती – बलखाती  फिगर  वाली  सेम  और  रेडीमेड  खस्ते ।
हमने  सोचा  ये  सेम  तो  बहुत  हल्की  होती  है  किलो  भर  भी  खा  लेंगे  तब  भी  डकार    आने  की । खस्ता  खाकर  क्या  करेंगे  हमारी  स्वयं  की  ही  हालत  इतनी  खस्ता  रहती  है । इसलिए  अब  दो  ही  विकल्प  बचे , हम  बोले – हम  समोसा  भी  खाएँगे  और  जलेबी  भी ।
हमारी  बात  सुनकर  बंसी  का  माथा  कुछ  वक्र  रेखाओं  की  चउदर  में    गया , बोला – दोनों  खाएँगे ? चलिए  ठीक  है  सेठजी  वो  का  है    कि  एक  चीज  बनाने  में  कम  समय  लगता  और  दो  चीज  बनाने  में  ज्यादा  समय  लगेगा । खैर  हम  अभी  मैदा  बूँद  देते  हैं  और  दन्नू  के  आते  ही  फटाफट  चाय  बना  देंगे ।
हम  बोले – हाँ  तो  समय  लो  न । हमारे  पास  अगर  किसी  चीज  की  कमी  नहीं  है  तो  वो  है  समय ।
मन  ही  मन  हमने  कहा  कि  वैसे  भी  जितना  समय  हम  दुकान  पर  बैठेंगे  उतनी  ही  अधिक  जनराय  हमें  पता  चलेगी । हमने  सोचा  अब  इनसे  असहिष्णुता  के  विषय  में  जनराय  पूछनी  चाहिए । पर  ऐसे  सीधे  जनराय  पूछना  सही  होगा ? चलो  ऐसा  करते  हैं  कि  पहले  दो – चार  इधर – उधर  के  प्रश्न  पूछते  हैं  फिर  आएँगे  जनराय  पर । पर  इधर – उधर  की  बात  करें  कौन  सी ? हम  सोच  ही  रहे  थे  कि  दन्नू  अंदर  से  आया  और  लग  गया  बर्तन  धोने । हमने  सोचा  बंसी  ऊपर  की  सीढ़ी  है  इसे  बाद  में  पकड़ा  जाए । पहले  दन्नू  को  बातों  में  लउदरते  हैं ।
हम  बोले – तो  दन्नू  तुम  पढ़ते  हो ?
दन्नू  बोला – पढ़ता  था  पर  एक  दिन  स्कूल  के  मैनेजर  ने  प्रिंसीपल  को  नौकरी  से  निकाल  दिया  क्योंकि  सभी  बच्चों  की  फीस  सख्ती  से  नहीं  ले  पा  रहे  थे । उसी  दिन  मैंने  पढ़ाई  छोड़  दी । ऐसी  पढ़ाई  से  भी  क्या  फायदा  जब  जलालत  जिंदगी  से    जाए । जब  जलालत  से  ही  जीना  है  तो  पढ़ने  में  दिमाग  क्यों  लगाएँ ?
लयो  मार  दिया  व्यवस्था  पर  तमाचा  एक  किशोर  ने । हमने  दूसरा  प्रश्न  किया – अच्छा  तुम्हें  ये  काम  अच्छा  लगता  है ?
अपने  लम्बे  बिखरे  बालों  को  खुजाकर  पहले  तो  दन्नू  ने  हमें  घूरकर  देखा  फिर  बोला – अक्सर  अच्छा  लगता  है  पर  जिस  दिन  कोई  टैम  से  पहले  जगा  देता  है  तो  माँ  कसम  बहुत  गुस्सा  आती  है ।
हम  समझ  गए  उसका  संकेत  हमारे  द्वारा  समय  से  पहले  जगाने  पर  था । किसी  निर्धन  की  नींद  खराब  करना  शेर  को  घायल  करने  सरीखा  होता  है । क्योंकि  ये  वैसे  भी  मेहनत  करके  सोते  हैं  तो  इन्हें  संतोषप्रद  नींद  भी  आती  है । अब  दन्नू  से  बात  करना  ठीक    था । अब  बंसी  को  पकड़ते  हैं  पर  इससे  भी  पहले  इधर – उधर  की  बात  करते  हैं ।
पर  बात  क्या  करें ? कोई  समसामयिक  मुद्दा  पकड़ते  हैं  जिससे  पता  भी  चल  जाएगा  कि  बंसी  अपडेट  रहता  भी  है  या  नहीं । हम  बोले – बंसी  एक  बात  बताओ  दिसम्बर  का  आखिरी  चल  रहा  है  पर  ठण्ड  नहीं  पड़  रही  ऐसा  क्यों  हो  गया ?
बंसी  बोला – हा  हा  हा...............का  करे  सेठजी  ठण्ड  पड़कर  भी । पहले  के  जमाने  में  लोगों  के  पास  क्या  था  एक  अँगीठी  होती  थी  जिसमें  कोयला , लकड़ी  जलाकर  लोग  ठण्ड  दूर  करते  थे । अब  कोयला  कमरे  में  तो  जलाया  नहीं  जाता  था । गली  में  कोई  एक  जना  गेट  पर  अँगीठेऐ  जला  लेता  था  और  चार  घरों  के  लोग  आकर  उसी  पर  तापते  थे । मोहल्लेदारी  की  सारी  बातें  वहीं  हो  जाती  थीं । अब  सबके  पास  हो  गए  हीटर  और  एक – दूसरे  से  बात  करने में  रूचि  भी  खत्म  हो  गई  है । सब  हीटर  जलाकर  कमरे  में  घुसे  रहते  हैं  तो  भगवान  ने  भी  सोचा  होगा  कि  ठण्ड  भी  क्यों  पड़े । पर  फिर  भी  सेठजी  मौसम  की  मार  पड़ती  तो  गरीब  पर  ही  है । ठण्ड    पड़ी  और  बारिश    हुई  तो  फसल    होगी  और  फसल  अच्छी    हुई  तो  फलेंगे – फूलेंगे  सूदखोर । खैर  मौसम  कोई  भी  हो  बंसी  का  तो  एक  ही  काम  है  कि  वो  अपनी  नीँबू  वाली  मसाला  चाय  से  गर्मी  में  थकान  दूर  करे  और  अदरक  वाली  चाय  से  सर्दी  में  ठण्ड  भगाए ।
दन्नू  की  ओर  देखकर  बंसी  बोला – ला  भगौना  दे  पहले  इधर  चाय  बनने  रखूँ   और  आलू  छील  फटाफट । सेठजी  बैठे  हैं  बहुत  देर  से ।
गहरा  विश्लेषण  था  बंसी  का । ये  व्यक्ति  बिल्कुल  ठीक  है  जनराय  जानने  के  लिए । चाय  भी  बनने  रख  चुकी  है  अब    जाना  चाहिए  मुद्दे  पर । हमने  बहुप्रतीक्षित  प्रश्न  ठोंक  ही  दिया – अच्छा  बंसी  आजकल  चारों  ओर  एक  ही  मुद्दा  छाया  हुआ  है  असहिष्णुता । पता  नहीं  कैसे  फैल  गई ?
बंसी  बोला – अरे ! सेठजी  ये  असहिष्णुता  तो  कुछ  कहिए  मत । बेड़ा  गर्क  कर  रखा  है  इसने । दिन  भर  लोग  इसी  की  बात  करते  हैं  और  हमारी  दुकान  का  ये  टी0वी0  भी  लोग  बस  समाचार  ही  देखते  रहते । पहले  पुराने  गाने  चलते  पर  अब  यही  असहिष्णुता  चलती  रहती  है । अच्छा  खून  पीया  है  इसने ।
हम  बोले – पर  फैली  कैसे  ये ? इतना  शोर  तो  तब  भी    हुआ  था  जब  भारत – पाकिस्तान  अलग  हुए  थे ।
बंसी  बोला – सेठजी  सब  बखत – बखत  की  बात  है । अब  हाथ  में  फोड़ा  निकल  आए  तो  भी  आदमी  दुनिया  भरके  काम  कर  सकता  है  पर  अगर  पैर  में  फोड़ा  निकल  आए  तो  पक्का  लँगड़ाएगा । वैसे  इन  नेताओं  का  भी  जबाव  नहीं  अंग्रेजों  ने  70  साल  पहले  जो  फसल  बोई  थी  हिंदू – मुस्लिम  में  अलगाव  की  उसे  ये  आज  तक  काट  रहे । किसी  का  जखम  देख  लें  तो  उस  पर  मरहम  लगाने  के  बजाय  कुरेदने  लगेंगे ।
हाँ  बिल्कुल  सही  विश्लेषण  बंसी  हम  अपने  मस्तिष्क  में  नोट  करे  जा  रहे  हैं  ये  सब  बातें  लिख  डालेंगे  और  अपने  को  महान  विश्लेषक  सिद्ध  करेंगे । हमने  आगे  कहा – वैसे  बंसी  हमें  लगता  है  कि  हिंदू – मुस्लिम  के  बीच  ये  खाई  पटना  मुश्किल  है  क्योंकि  इसे  खोदा  है  अंग्रेजों  ने । अब  अंग्रेजों  की  तो  सारी  चीजें  वैसे  ही  बहुत  मजबूत  हैं । उनके  बनाए  पुल  ही  देख  लो  कईयों  की  एक्सपाइरी  निकले  20  वर्ष  हो  गए  हैं  पर  फिर  भी  बढ़िया  चल  रहे  हैं । जबकि  आज  के  ठेकेदार  ऐसे  पुल  बना  रहे  हैं  कि  जब  तक  रेलिंग  लगने  का  नम्बर  आता  है  उसमें  छेद  होने  लगते  हैं ।
अबकि  बंसी  ने  कोई  उत्तर    दिया  हमें  देखकर  केवल  मुस्कुराए । फिर  दन्नू  से  कहा – चल  दन्नू  चाय  में  सब  कुछ  डाल  दिया  है  देखता  रह  बस  उबलकर गिरे  न । आज  समोसे  और  जलेबी  मैं  बनाऊँगा ।
दन्नू  बोला – पर  तुम  क्यों  बनाओगे ? काम  सही  तो  कर  रहा  हूँ  न । मुझे  निकालने  के  तो  चक्कर  में    हो  न ।
बंसी  बोला – अगर  अभी  चाय  पर  ध्यान    दिया  तो  जरूर  निकाल  दूँगा  अब  हट  यहाँ  से ।
अब  बंसी  ने  जलेबी  और  समोसे  बनाने  की  कमान  सँभाल  ली  थी  और  मंद  आँच  पर  रखी  चाय  की  चौकीदारी  दे  दी  थी  दन्नू  को । आलू  को  कढ़ाई  में  डालकर  बंसी  बोला – वैसे  सेठजी  एक  बात  बताऊँ  समय  लगता  है  कोई  काम  करने  में । अगर  काम  करने  वाले  को  कोई  काम  करने  दे    इतिहास  भी  बदल  जाता  है । अब  तीन – चार  सौ  साल  अंग्रेजों  ने  राज  किया  भारत  पर । पर  जब  उनको  उखाड़  फेंका  हम  लोगों  ने  तो  उनके  जहर  के  बीज  को......
बंसी  की  बात  पूरी  होने  से  पहले  ही  दन्नू  बोला – अरे ! जे  का  डाल  रहे  हो  आलू  में ?
बंसी  बोला – तू  काम  देने  मोए  को  मेरे  हिसाब  से  बस  चाय  पर  नजर  रख ।
दन्नू  मुँह  बिचकाकर  रह  गया । सेठजी , अंग्रेजों  के  जहर  का  बीज  तो  यूँ  ही  खतम  हो  जाए  बस  उसको  खाद  पानी    मिले । उजले  मुखड़ों  वाले  ने  जो  काम  किया  उसे  उजले  लिबास  वाले  खतम  करने  के  बजाय  बढ़ा  रहे ।
फिर  5  मिनट  ऐसे  ही  शांति  रही । बंसी  ने  8 – 10  जलेबियाँ  तलीं  और  उन्हें  निकालकर एक  बर्तन  में  रखा । दन्नू  पुन:  बोल  पड़ा – अरे ! अब  जे  का  कर  रहे  हो  सब  जलेबिन  का ........
दन्नू  की  बात  पूरी  होने  से  पहले  ही  बंसी  जोर  से  बोला – तू  चाय  का  खौला  देख  पहले ।
दन्नू  ने  भगौने  में  चाय  का  उबाल  देखकर  तुरंत  चूल्हा  बंद  किया । बंसी  बोला – अपने  काम  में  ध्यान  है    मेरे  काम  में  अड़ँगा  लगा  रहा  है । जा  जाकर  चाय  देकर    सेठजी  को  फिर  प्लेट  में  जलेबी  लगा  मैं  समोसे  तलता  हूँ  तब  तक ।
दन्नू  बोला – ठीक  है  हम  काहे  अड़ँगा  लगाएँगे । पर  काका  तुम्हारा  दिमाग  जरूर  सड़  गया  है  जे  असहि.....सू  जो  भी  है  उसके  चक्कर  में ।
दन्नू  बार – बार  क्यों  टोक  रहा  है  बंसी  को ? ये  बंसी  का  प्लान  क्या  है ? कहीं  ऐसा  तो  नहीं  कि  दुकान  पर  मुझे  अकेला  देख  कुछ  मिलाकर  दे  दे  चाय  में  और  मेरी  खटारा  द्विचक्रवाहिनी  और  सस्ता  मोबाइल  लूट  ले । हम  सोच  ही  रहे  थे  कि  चाय    गई । चाय  सुरक्षित  थी  क्योंकि  दन्नू  ने  बनाई  थी । दन्नू  चाय  रखकर  चला  गया । हमने  चाय  का  पहला  कश  अर्थात  पहली  चुस्की  ली । अहा ! चाय  तो  बंसी  की  वास्तव  मे  अति  उत्तम  थी । दन्नू  ने  जलेबी  और  समोसे  दो  प्लेटों  में  रखी  और  ले  आया  मेज  पर ।
हमने  जलेबी  और  समोसे  को  देखा  समझ  नहीं    रहा  था  कि  खाएँ  या  नहीं । मस्तिष्क  ने  कहा  कहीं  ऐसा    हो  कि  खाएँ  और  लुढ़क  जाएँ  तभी  उदर  ने    कहा  आज  तक  मस्तिष्क  की  मानकर  ही  सारे  काम  किए  हैं  क्या ? चुपचाप  खाओ  और  मुझे  संतुष्ट  करो । अगर  लूट  भी  लिया  तो  भी  इन  पुरानी  चीजों  से  छुटकारा  मिलेगा  चुपचाप  उठाओ  और  खा  लो ।
स्पष्ट  था  कि  हम  उदर  की  ही  बात  सुनते । हमने  सोचा  पहले  चटपटा  खाएँ  तो  उठाया  समोसा  और  दाँत  गड़ा  दिए । पर  आएँ  ये  कैसा  स्वाद  आया  मीठा  लगा  ये  तो । लगता  है  हमारी  खोपड़ी  इस  असहिष्णुता  के  चक्कर  में  सत्यानाश  हो  गई  है  जो  चटपटे  को  मीठा  समझ  रहे  हैं । हमने  चाय  की  तीन  चुस्कियों  के  साथ  समोसा  समाप्त  किया ।
बंसी  बोला – सेठजी , समोसा  कैसा  लगा ?
हम  सकुचाकर  बोले – समोसा , हाँ  समोसा , बहुत  बढ़िया । पर  ऐसा  लगा  जैसे  पान  की  दुकान  पर  पिज्जा  खाया  हो ।
बंसी  बोला – अभी  जलेबी  खाएँगे  तो  ऐसा  लगेगा  कि  चाट  वाले  की  दुकान  पर  आइसक्रीम  खा  रहे  हों ।
हम  अपनी  बात  कहकर  स्वयं  ही  उसका  अर्थ  नहीं  समझ  पाए  थे । ऊपर  से  बंसी  ने  एक  और  पहेली  लाद  दी  थी । भाड़  में  गया  पहेली  का  अर्थ  पहले जलेबी  सपोटें । हमने  प्लेट  की  सबसे  बड़ी  जलेबी  उठाई  और  दाँतों  को  समर्पित  करी  पर  ये  क्या  ये  तो  नमकीन  लग  रही ।
अब  हमसे    रहा  गया , हम  बोले – ये  क्या  है  बंसी ? तुम्हारी  दुकान  पर  समोसे  मीठे  थे  और  जलेबी  नमकीन  ऐसा  क्यों ?
बंसी  ने  मारा  गगनभेदी  ठहाका  और  कहा – सेठजी  बताएँगे  पर  पहले  आप  ये  बताओ  कि  आपको  समोसे  का  मीठापन  और  जलेबी  का  चटपटापन  अच्छा  लगा  कि  नहीं ?
हम  बोले – चूँकि  पहली  बार  खाया  इसलिए  अटपटा  तो  लगा  पर  फिर  भी  अच्छा  लगा । इतना  अच्छा  जितना  कभी  चटपटा  समोसा  और  मीठी  जलेबी  भी  नहीं  लगी ।
बंसी  बोला – सेठजी  यही  तो  बात  है  समोसे  से  हमेशा  उम्मीद  रखी  जाती  है  कि  वो  चटपटा  हो  और  जलेबी  से  ये  कि  वो  मीठी  हो । पर  अगर  ये  दोनों  एक – दूसरे  के  स्वाद  को  पा  लें  और  दिखने  में  वैसे  ही  रहें  तो  लोगों  के  मन  को  भा  जाते  हैं । हमने  समोसे  में  नमक  के  बजाय  डाली  चीनी  और  जलेबी  को  चाशनी  के  बजाय  डाला  नमक  के  पानी  में । अब  स्वाद  बदला  तो  बात  आपके  दिल  में  उतरी  न ।
अब  देखिए  सेठजी  अखबार  में  कभी – कभी  ये  खबर  आती  है  कि  उस  मंदिर  में  मुस्लिमों  ने  श्रमदान  किया  या  उस  मस्जिद  के  लिए  हिंदुओं  ने  जगह  दी  तो  बंसी  की  दुकान  पर  दिन  में  दसियों  ग्राहक  इस  खबर  को  जोर – जोर  से  पढ़कर  सुनाते  हैं  और  सबके  मन  को  पसंद  आती  है  ये  बात । पर  फिर  भी  हर  इंसान  इसे  अपनी  रोजमर्रा  की  जिंदगी  में  शामिल  नहीं  कर  पाता । पता  नहीं  क्यों  खूँटे  से  सोच  को  बाँधे  रखता  है । पर  सेठजी  जिस  दिन  हिंदू  और  मुस्लिम  में  पहले  जैसी  मोहब्बत  ने  जोर  मारा    कसम  से  सोच  के  खूँटे  उखाड़कर  गले  मिलेंगे  दोनों ।
हम  तो  जनराय  लेने  आए  थे  पर  बंसी  ने  तो  अनमोल  सबक  दे  दिया  था  वो  भी  अद्वितीय  तरीके  से । हम  बोले – वाह  बंसी  वाह  तुम्हारी  बातों  की  चाय   सी  मिठास  और  उनका  नुकीलापन  बिल्कुल  समोसे  के  तिकोनों  सा  है  और  ये  जलेबी  की  भाँति  गोल – गोल  करके  एक  छोर  पर  रुक  जाने  के  स्टाइल   में  बात  समझाना  हमें  तो  बहुत  भा  गया ।
हम  और  भी  कुछ  बोलते  पर  चाय  ने  हमारे  उदर  में  गुड़गुड़  मचा  दी  थी । ओहो ! पुन: शौचालय  जाना  पड़ेगा , हम  बोले – बंसी  तुमसे  बात  करने  का  और  मन  है  पर  उदर  नहीं । इसलिए  शीघ्र  ही  अपना  बिल  बताओ  तो  हम  चुकता  करके  चलें ।
हमारे  उदर  पर  हाथ  रखकर  ये  कहने  से  बंसी  हमारी  उदरोदशा  समझ  चुका  था , बोला – सेठजी , बंसी  की  दुकान  पर  काम  जल्दी  और  दाम  कम  ही  रहता  है । बस  30  रूपए  दे  दीजिए ।
हमने  अपने  फटेहाल  हुए  पर्स  से  10  के  करारे  3  नोट  निकालकर  बंसी  को  दिए  और  चल  दिए ।
हमारे  जाते – जाते  बंसी  बोला – वैसे  सेठजी  एक  बात  कहूँ  अगर  चायवाले  को  उसके  मन  की  करने  दी  जाए    तो  वो  सब  ठीक  कर  सकता  है  पर  नासमझ  लोग  करने  नहीं  देते  जैसे  ये  दन्नू  नहीं  करने  दे  रहा  था ।
बंसी  के  चेहरे  पर  मुस्कान  थी । हमने  अपनी  द्विचक्रवाहिनी  उठाई  और  चल  दिए  घर  की  ओर । एक  बात  आज  सीख  ली  थी  अगर  कोई  मन  से  दूसरे  को  स्वीकार  ले  तो  जीवन  बहुत  ही  सरल  हो  जाएगा  और  असहिष्णुता  पाताल  के  गर्त  में  सदैव  के  लिए  समा  जाएगी ।
है  न...................................


लेखक
प्रांजल सक्सेना 
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बुधवार, 11 मई 2016

कश्ती

“ बस यही घुमाने की हैसियत है हमारी । ”

“ जन्नत की सैर कराने वाले अपनी हैसियत को नहीं कोसा करते । ”

लटकाए हुए मुँह के साथ नदी में गिर रहे राजू के आत्मविश्वास को चिलरी ने सहारा दिया ।
राजू ने नजरें झुकाते हुए कहा - “ हम क्या दे पाएँगे तुम्हें , तुमने बियाह को हाँ क्यों बोला ? ”

“ न बोलकर किसी राजा से बियाह जाते क्या ? ” कहकर चिलरी ने ठहाका लगाया । फिर आगे कहा - “ अरे ! गरीब तुम भी , गरीब हम भी । जिंदगी तो यूँ ही गरीबी में ही कटनी है । पर साथी ऐसा हो जो गरीबी की गठरी के बोझ को साध ले तो जिंदगी कोई मुश्किल न लगेगी । ”

बीच नदी, चाँदनी रात और मद्धम गति की हवा में उड़ते हुए चिलरी के बाल राजू को चिलरी के प्रति और आकर्षित कर रहे थे । पर राजू के मन में एक अपराध बोध - सा था । वो इस बोझ से मुक्त होना चाहता था । दो पल के मौन के बाद राजू की जिव्हा शब्दों को और पकड़कर न रख सकी , उसने कहा - “ अच्छा चिलरी तुम तो गुनी छोरी हो । पूरे गाँव में तुम्हारा नाम है - मसाला पीसने से लेकर सुंदर गोल कण्डे बनाने तक । अच्छी छोरियों को तो अच्छा घर मिल ही जाता है और तुम तो घर पर 12वीं भी पढ़ रही थीं न । ऊपर से कई छोरे चाहते थे तुम्हें । वो जगन वो तो तुम्हारे आगे - पीछे घूमता था । वो पैसे भी हमसे अच्छे कमाता है तुम्हें खुश रखता । ”

चिलरी ने मुँह बिचका लिया - ” क्या खुश रखता जगन । दो बार पिट चुका है वो मेले में लड़की छेड़ने में । ऐसे लड़कों का कोई ईमान नहीं होता । हमें चमड़ी से प्यार करने वाला नहीं चाहिए था । हमारे दिल से प्यार करने वाला चाहिए । चमड़ी की रौनक को कित्ते दिन पकड़कर रख सका है कोई । अरे ! चमड़ी का हिसाब तो दौलत जैसा होता । जित्ती बार गिनो उत्ती ही कम होती जाती और हाँ अब दुबारा ये बात मत करना कि हमें तुम से बियाह नहीं करना चाहिए था । ”

राजू के मन की हालत ऐसी थी मानो उसे कोई हीरा मिल गया हो और वो उसकी चमक को सम्भाल न पा रहा हो । पर हीरे ने ही कह दिया था कि उसे धूल फांककर कोयला जैसा बनना पसन्द है पर तिजोरी में रहना नहीं । तो राजू के मन में कोई सन्देह नहीं था । अब तक हीरे को धरोहर मानकर चलने वाला राजू अब हीरे के मालिक सरीखे था । राजू के मन से ये विचार कोसों दूर हो चुका था कि चिलरी कभी भी उससे अलग हो सकती है । अब राजू को चिलरी के साथ सपने सजाने का पूरा अधिकार था ।

राजू - “ अच्छा तुम्हारे का - का सपने हैं हमारे साथ ? कछु तो सोची होगी । ”

चिलरी - “ सोचे काहे न हैं । जिस दिन से बापू रिश्ता पक्का किए हैं तब से बस तुम्हारे और अपने बारे में सपने ही तो देख रहे हैं । हमें तुम्हारे साथ खेत में गन्ना खाना है , कश्ती तो अपनी है ही कभी - कभी घुमा दिया करना , हरिया की दुकान पर हर हफ्ता नई चूड़ी आतीं हैं वो कभी - कभी दिला दिया करना और हाँ वो कान्हा जी के मेले में इमली वाला खट्टा बताशा आता है वहाँ पेट भर के बताशे खिला दिया करना बस । ”

“ औ.....और साड़ी ?........साड़ी तो औरतें सबसे पहले मांगतीं हैं वो न माँगीं तुमने । ” - राजू ने विस्मय से पूछा ।

चिलरी - “ साड़ी कैसे माँगें तुमसे ऊ तो महँगी आत है न । दूजे तुम्हारी दुई-दुई बहनें हैं । तुम्हें उनकी शादी को भी तो पैसा जोड़ना है । ”

राजू - “ अरे ! तो इत्ते कम थोड़े ही न कमात हैं कि साड़ी भी न पहना पाएँ तुम्हें । कभी-कभी सैलानी जेब भर के पईसा दे जात हैं । ”

चिलरी - “ अच्छा ठीक है बाबा जिस दिन सैलानी तुम्हें भर जेब पैसा दें उस दिन हमें साड़ी भी ले आना । ”

बीच नदी में हिचकोले लेती नाव में राजू के साथ प्रेमपूर्ण संवाद का कोई अवसर चिलरी गंवारा नहीं करना चाहती थी , उसने कहा - “ अच्छा राजू तुम भी तो कुछ सपने देखे होंगे न । बताओ न हम तुम्हारे सपने कैसे पूरे करें ? ”

राजू ने शर्माकर कहा - “ अरे ! हम का सपने देखते । हम तो कभी ये ही न सोचे कि हमारा बियाह होगा और अब बियाह भी हुआ वो भी तुम जैसी गुनी छोरी से यही बहुत है । ”

चिलरी - “ फिर वही बातें । अच्छा जब बियाह तय हुआ तब तो कुछ सोचे होगे न । ”

राजू - “ हम का सोचते । बस जैसे रामू , दीपू और मलखान अपना खाने का डिब्बा लाते हैं । वैसे ही हमारे लिए भी बना दिया करना । ”

चिलरी - “ अरे ! बस इत्ती सी बात । हम तुम्हारे लिए रोज बढ़िया खाना बनाकर दिया करेंगे और साथ में अचार और चटनी भी । ”

राजू - “ अरे ! जे अचार और चटनी की क्या जरूरत है । बस छाह रोटी और एक ठो सब्जी , पेट भरे खातिर इत्तो काफी । ”

चिलरी - “ हाँ - हाँ तुम तो हमारी इज्जत खराब करवा दोगे । नया - नया बियाह हुआ है , अब खाने का डिब्बा लेकर जाओगे तो तनिक खाना खबसूरत तो लगना चाहिए । ”

राजू - “ अच्छा जैसी तुम्हारी मरजी । ”

कुछ रुककर राजू ने कहा - “ वैसे तुम्हें बुरा लग रहा होगा न कि हमारी पहली रात है और खटिया पर जोराजोरी के बजाय तुम्हें यूँ कश्ती में घुमा रहे । ”

चिलरी - “ अरे ! हमें काहे बुरा लगेगा हमें तो अच्छा लग रहा है । ” चिलरी मुस्कुराई फिर कहा - “ शहरी लोग पहली रात को क्या - क्या न करते । फूल लाते , नरम बिस्तर पर सोते , तरह - तरह के इत्र छिड़कते । पर हमारी पहली रात हमें हमेशा याद रहेगी । तुम रिश्तेदारों से बचाकर खिड़की के रस्ते हमें खुली हवा में लाए । फिर रात के 2 बजे अपनी कश्ती में हमें घुमा रहे हो । इस समय पूरी नदी में न कोई सैलानी है न कोई कश्ती । हम यहाँ तुमसे खुलकर अपने दिल की बात कह सकते हैं । घर में गहरी साँस भी ले लेते तो बाहर सबकी नींद खुल जाती । ”

तभी एक तेज लहर आई और कश्ती डांवाडोल हुई । राजू घबरा गया और बातें छोड़कर गम्भीरता से पतवार को सही दिशा में चलाने लगा ।

इसी बीच राजू की नजर चिलरी की ओर गई । राजू जितना घबराया हुआ था चिलरी उतनी ही शांत थी । राजू ने कहा - “ तुम्हें डर नहीं लग रहा अभी पल भर में कश्ती पलट जाए तो । ”

चिलरी ने पूरे विश्वास से कहा - “ ऐसे कैसे पलट जाएगी । हमें पता है कि तुम कितनी अच्छी कश्ती चलात हो । इसीलिए तो अपनी जिंदगी की बागडोर तुम्हारे हाथ में दिए हैं । जैसे कश्ती अच्छी चलात हो वैसे ही गृहस्थी भी चला लोगे हमें यकीन है । ”

राजू - “ पता है लहर के बड़े - बड़े झोंके झेले हैं हमने । आज तक बड़े से बड़े पैसे वाले को बिठाने के बाद भी झोंको से ऐसे नहीं डरे पर इस छोटी सी लहर से डर गए क्योंकि तुम साथ थीं । हम समझ गए अब हमें प्यार हो चला है तुमसे । ”

चिलरी - “ प्यार की इकलौती यही तो बुराई है राजू कि दिल को कमजोर कर देती है जबकि नफरत दिल को मजबूत । पर फिर भी प्यार है तो तभी तो जिंदगी में रंग हैं ।.......अच्छा अब कश्ती किनारे भी ले चलो । घर भी जाना है । कहीं सब उठ गए तो शरम के मारे इसी नदी में डूबकर मरना पड़ेगा । ”

चिलरी और राजू खिलखिलाकर हँसे । राजू ने फटाफट कश्ती किनारे लगाई , रस्सी से बाँधी और दोनों घर को चल दिए । बड़ी सफाई से खिड़की के रस्ते अपने कमरे में दाखिल हुए और बिस्तर पकड़ा । बिस्तर पर लेटते ही बाहर मुर्गे ने बाँग दे दी । सब नाते रिश्तेदार ऊँघते हुए उठ पड़े ।

राजू - “ पहली रात जिंदगी की यादगार होती है । आखिर बीत ही गई अब दुबारा न आएगी । ”

चिलरी - “ रात तो बीतनी ही थी । बखत को रोकना तो हाथ में नहीं होता पर हर पल को जीना इंसान के अपने हाथ में होता है । जिंदगी में कई रातें जागकर गुजारी हैं पर वो मैय्यत के शोक की होती थीं । लगता था जल्दी से ये रात गुजरे । पहली बार ख़ुशी में रात गुजारी है और एक - एक पल जिया है । गुजरा हुआ कोई भी पल दुबारा नहीं आता इसलिए गुजरने से पहले हर पल को यादगार बना लेना चाहिए । ”

चिलरी की आशावान बातों ने राजू के चेहरे पर भी आशा का दीप प्रज्वलित कर दिया था ।

राजू - “ तुम इत्ती अच्छी - अच्छी बातें कैसे कर लेती हो । हम तो अपनी गरीबी से हमेसा परेशान रहते । ”

चिलरी - “ करेंगे न तो जिएँगे कैसे । वैसे भी कश्ती चलाने वाले को न तो घबराने की इजाजत होती है न ही परेशान होने की । उसे तो तूफान में भी पतवार को कसकर पकड़ना पड़ता है और किनारे तक पहुँचना होता है । अब हम ठहरे कश्ती चलाने वाले की बीवी तो ये गुन हममें भी होने चाहिए न । वैसे भी आज से हमें भी तो गृहस्थी की कश्ती चलानी सीखनी है । ”

तभी इन प्रणय भरे पलों में एक रिश्तेदार ने व्यवधान डाल दिया , दरवाजा खटखटाकर कहा - “ अरे ! अब बाहर न निकलोगे क्या , भोर हो गई है । सुहागरात खतम , काम शुरू । हा हा हा....... ”

चिलरी - “ अब बखत आ गया है कि हम दोनों अपने - अपने काम पर निकलें । कश्तियाँ इंतजार कर रही हैं । ”

लेखक
प्रांजल सक्सेना 
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शनिवार, 7 मई 2016

साँच को आँच कहाँ

पिछले कई दिनों से कोई लेख आप सबके समक्ष प्रस्तुत नहीं किया है । कारण कि एक तो जब से पदोन्नति हुई है , व्यस्तता बढ़ गई है । दूजे आजकल एक उपन्यास लिखने में व्यस्त हूँ । उसी उपन्यास की एक छोटी - सी घटना प्रस्तुत कर रहा हूँ । पढ़ते समय बस इस बात को ध्यान में रखिएगा कि ये दृश्य लगभग 1995 का है -

शहर में शोभित समाचार – पत्र बाँटकर लौट रहा होता है । मार्ग में उसे एक चौराहे पर नारद दिखाई देता है । नारद अजीब तरह से सड़क पर इधर – उधर जाते हुए लोगों को देख रहा था । उसके इस व्यवहार ने शोभित के कदम बढ़ने के स्थान पर रोक दिए और वो नारद को एकटक देखने लगा कि वो करना क्या चाहता है ? तभी एक बूढ़ी औरत जो सिर पर कुछ सब्जियाँ रखकर बेचने जा रही थी । उससे साईकिल सवार एक किशोर टकरा गया । बुढ़िया उससे टकरा गई और उसकी सारी सब्जियाँ बिखरकर गिर गईं ।
नारद मानो ऐसी ही किसी घटना की फिराक में था । वह भागता हुआ उसके पास पहुँचा । वहाँ भीड़ तो एकत्र हो ही गई थी । अब बुढ़िया और साईकिल सवार के मध्य शास्त्रार्थ आरम्भ हो गया । बुढ़िया जमीन पर तो गिर ही गई थी । अपने तलवे पकड़कर बोली – “ अरे ! मार दयो रे , नाशपीटे ! धीरे ही चला लेता साईकिल । ”
साईकिल वाला बोला – “ अरे ! अम्मा हम का करते हम तो सीधे ही चल रहे थे । तुम ही अचानक से मोड़ से निकलीं । ”
बूढ़ी अम्मा अपने तलवे दबाते हुए बोलीं – “ अरे ! तो मोड़ पर तुम्हें साईकिल को हवाई जहाज बनाने की क्या जरूरत थी ? धीरे ही चला लेते साईकिल । ”
अब भीड़ से स्वयंभू न्यायाधीशों की दलीलें आरम्भ हो गईं । एक व्यक्ति ने कहा – “ आजकल के लौंडों को कुछ दिखता थोड़े ही है । बस अड़ापेल चले जाते हैं । ”
दूसरे व्यक्ति ने कहा – “ साईकिल तो आजकल नैक – नैक से लड़कों को दे देते हैं । चाहें चलानी आए या नहीं पर सड़क पर चल देंगे तूफान बनकर । ”
भीड़ में सभी बूढ़ी अम्मा के ही पक्ष में थे । किशोर समझ गया कि उसके तर्क कोई न सुनेगा । इसलिए उसने क्षमा माँगने में ही भलाई समझी । उसने हाथ जोड़कर कहा – “ अच्छा अम्मा तुम्हारे हाथ जोड़ते हैं हमारी ही गलती थी । हम ही गलत साईकिल चला रहे थे । आगे से किसी भी मोड़ पर साईकिल से उतर जाया करेंगे और मुड़ने के बाद ही बैठा करेंगे । ”
अतिश्योक्ति अलंकार से परिपूर्ण शब्दों में किशोर ने क्षमा माँग ली थी । भीड़ का उद्देश्य पूरा हुआ तो वो तितर – बितर होने लगी । उसी समय नारद ने कहा – “ माफी तो हो गई पर नुकसान का क्या ? उसका मुआवजा तो नहीं मिला ? ”
किशोर ने कहा – “ नुकसान ? कैसा नुकसान ? अरे ! सब्जियाँ ही तो जमीन पर गिरी हैं । मैं उन्हें उठाकर रखने को तैयार हूँ । ”
कहकर किशोर साईकिल से उतरा और जमीन पर बिखरी सब्जियाँ उठाकर टोकरी में रखने लगा । सारी सब्जियाँ टोकरी में रखकर वो उठा और उसने कहा – “ लो हो गया गलती सुधार । माफी भी माँग ली और सारी सब्जियाँ भी वापिस टोकरी में रख दीं । अब जाऊँ.....ऊँ ? ”
नारद ने कहा – “ सारी कहाँ रख पाए ? उन टमाटरों का क्या जो नाली में गए ? उन तीन टमाटरों का क्या जो नाली में गए । उनके पैसे तो देते जाओ । ”
किशोर बोला – “ नाली में ? ”
नारद ने कहा – “ हाँ नाली में । जब अम्मा की टोकरी गिरी तो तीन टमाटर नाली में गए । लगभग 250 ग्राम टमाटर नाली में गए उनका मुआवजा तो देते जाओ ।
बूढ़ी अम्मा ने अपनी टोकरी देखी और कहा – “ लग तो पूरे रहे हैं । ”
किशोर ने कहा – “ लो ये अम्मा भी कह रही हैं कि पूरे हैं और फिर किसने देखा कि टमाटर नाली में गए हैं ? ”
नारद ने कहा – “ मैंने , मैंने देखा नाली में टमाटर जाते हुए । ”
फिर नारद ने अब तक जमीन पर ही बैठी अम्मा के दोनों कंधों पर हाथ रखा और उनके पीछे घुटनों पर बैठ गया । भीड़ में वो अम्मा का पूर्ण हितैषी लग रहा था । उसने कहा – “ अम्मा की नजर कमजोर है , अम्मा अंदाज नहीं लगा पा रही हैं कि कितना सामान था ? इसका ये मतलब कतई नहीं है कि कोई भी उन्हें धोखा दे दे । मैं साथ हूँ अम्मा के । मैंने देखा है टमाटरों को नाली में जाते हुए और तुम्हें मुआवजा दिए बिना मैं यहाँ से जाने नहीं दूँगा । ”
किशोर ने पसीना पोंछते हुए कहा – “ अब ये कौन – सी जुगत है भाई ? माफी माँग तो ली अब मुआवजा भी माँग रहे । जबकि किसी ने नहीं देखा कि एक भी टमाटर नाली में गया हो । ”
नारद उठकर खड़ा हुआ और उसने कहा – “ शक है ?................शक है ? तो इस नाली में हाथ डालकर देख लो । अभी ज्यादा पानी बहा नहीं है । यहीं आस – पास ही मिल जाएँगे टमाटर । साँच को आँच कहा । ”
किशोर ने कहा – “ अरे ! नहीं , नहीं , बिल्कुल नहीं । मुझे कोई शौक नहीं नाली में हाथ डालने का और वैसे भी अम्मा तो कुछ कह नहीं रहीं तुम्हीं जबरदस्ती की वकालत किए जा रहे हो । ”
नारद ने कहा – “ अम्मा कित्ती उमर हो गई है तुम्हारी ? ”
बूढ़ी अम्मा ने कहा – “ पतो नाए लला , पर आजादी को आँखों से देखा था । ”
नारद ने कहा – “ आजादी को आँखों से देखा था यानि कि 60 – 70 की होगी ।.......अच्छा ये बताओ कि क्या तुम्हें सब बातें याद रहती हैं ? ”
अम्मा ने कहा – “ ना बेटा , अब इस उमर सब कुछ कहाँ याद रहेगो ? ”
फिर नारद जमीन पर बैठ गया और दोनों हाथ जादूगर की तरह उठाकर आँखें बड़ी करके कहा – “ वही तो , वही तो अम्मा , बुढ़ापे में आपकी याद्दाश्त और नजर दोनों कमजोर हो गईं हैं ।.........तुम्हें याद नहीं है तीन टमाटर जो ऊपर रखे थे वो तुम्हारे गिरते ही सर्रर्र...से नाली में चले गए । नुकसान हुआ है तुम्हारा , मुआवजा तो माँगो । ”
अब अम्मा भ्रमित हो गई थीं । उन्होंने टोकरी को गौर से देखा फिर कहा – “ शायद कम ही हैं । तुम सही कह रहे हो लला । हाँ कम हैं टमाटर.............लावो रुपईया । ”
नारद मुस्कुराया और कहा – “ हाँ , ये हुई न बात । ”
किशोर ने कहा – “ ये अच्छा है । जबरदस्ती टमाटर नाली में गिर गए । जाओ मैं तो नहीं दूँगा पैसे । ”
नारद ने कहा – “ अरे ! लौंडे एक बात सुन सिर्फ टमाटर ही नाली में नहीं गिरे हैं । मूली भी जमीन पर गिरने से गंदी हो गई है । एक बैंगन भी गिरने से थोड़ा फट गया है । अब बताओ पैसे देते हो या इनका भी बिल जोड़कर बताऊँ ? ”
किशोर ने कहा –“ नहीं , बिल्कुल नहीं । तुम्हारा बस चले तो सारी सब्जी के पैसे मुझसे ही ले लो ।..........ये लो अम्मा एक रूपया । ”
किशोर ने बूढ़ी अम्मा की ओर सिक्का बढ़ाया । अम्मा की आँखों में चमक आ गई । न तौलने की मेहनत लगी न ग्राहक से झिकझिक हुई और 250 ग्राम टमाटर के पैसे भी मिल गए ।
तभी नारद ने कहा – “ एक रूपया , बस एक रूपया ? ”
किशोर ने कहा – “ हाँ एक रूपया और कितने । तीन टमाटर होते ही कितने हैं 250 ग्राम और कल मैंने बाजार से चार रूपए किलो के भाव से टमाटर लिए थे । उस हिसाब से एक रूपया ही तो बना । ”
नारद ने कहा – “ लिए होंगे , जरूर लिए होंगे । पर वो टमाटर ऐसे टमाटर न होंगे । ”
नारद ने एक मोटा ताजा टमाटर टोकरी से उठाया और कहा – “ ये देखो इस टमाटर को देखो क्या ताजगी है इसकी । दब भी नहीं रहा , पिलपिलाहट बिल्कुल नहीं और....और साइज तो देखो । इसी साइज के तीन टमाटर नाली में गए हैं । 250 नहीं 350 ग्राम नाली में गए होंगे । ऊपर से ये टमाटर भी अच्छी किस्म का है । ये चार नहीं छह रूपए किलो के अर्त – पर्त बिकेगा । इस हिसाब से इस टमाटर के एक रूपए पिचहत्तर पैसे बनते हैं । ”
किशोर ने ठोड़ी को गर्दन से चिपकाया जिससे उसकी गर्दन में दो सिलवटें पड़ गईं फिर उसने कहा – “ हाँ , हाँ दुगुने दाम ले लयो । एक रूपए के एक रूपए पिचहत्तर पैसे । ”
नारद ने तिरछी नजरें करते हुए बूढ़ी अम्मा से कहा – “ अम्मा ! ये जिन मूलियों पर धूल लग गई है , उनका दाम कितना होगा ? ”
किशोर ने चीखते हुए कहा – “ पिचहत्तर पैसे से ज्यादा बिल्कुल नहीं । ये लो पिचहत्तर पैसे और बख्शो मुझे । ”
कहकर किशोर पिचहत्तर पैसे अम्मा की ओर बढ़ाए और साईकिल लेकर भाग गया । उसके जाने के बाद भीड़ भी छँट गई । केवल नारद और बूढ़ी अम्मा रह गए । अम्मा ने नारद से कहा – “ बहोत – बहोत शुक्रिया लला । तुमने टमाटर नाली में जाते देख लिए और अच्छे पैसे भी दिला दिए । ”
बूढ़ी अम्मा दीवार के सहारे से खड़ी हो गईं और सब्जी की टोकरी भी उठाकर सिर पर रख ली । तभी नारद ने कहा – “ अम्मा , जब लला बोल रही हो तो अम्मा वाला एक फर्ज तो अदा करती जाओ । ”
अम्मा ने विस्मय से कहा – “ कौन – सा फर्ज लला ? ”
नारद ने कहा – “ अम्मा हम तुम्हें फोकट के एक रूपया और पिचहत्तर पैसे दिलाए । हमें कम से कम पचास पैसे तो देती जाओ । ”
अम्मा ने कहा – “ फोकट में ?.....................पर ऊ तो हमारे टमाटर के हैं जो नाली में गए थे । ”
नारद मुस्कुराया और कहा – “ कौन – से टमाटर अम्मा ? कोई टमाटर नाली में न गया है । अब तुम सवेरे – सवेरे उस लौंडे से टकराईं और लौंडा भी अच्छे कपड़े पहना था । सो मैंने सोचा कि तुम्हें कुछ पैसे दिलवा दूँ और तुम हो कि मुझे कमीशन में एक फूटी कौड़ी भी न दे रहीं । ”
अम्मा ने पूछा – “ तो का टमाटर नाली में नहीं गए थे ? ”
“ अरे ! और क्या , एक भी टमाटर नाली में न गया था । चाहों तो नाली में हाथ डालकर देख लो । साँच को आँच कहाँ । ” – नारद ने उत्तर दिया ।
अम्मा ने कहा – “ अरे ! हम न डालेंगे नाली में हाथ । सवेरे – सवेरे नहाकर आए हैं । आज शुक्रवार है संतोषी माता के मंदिर में मत्था भी टेकना है । हम नाली में हाथ न डालेंगे । तुम बेफालतू में झूठे पैसे दिलवा दिए हमें । ”
नारद ने कहा – “ अम्मा , झूठे पैसे न थे , मुआवजे के थे । अब वो लौंडा तुमसे टकराया तो था न । इस बात के वो तुम्हें कोई पैसे न देता इसलिए हमने टमाटर नाली में जाने की कहानी बना दी । ”
अम्मा ने रूआँसी होकर कहा – “ जबरदस्ती पाप का भागीदार बना दिया हमें । ”
नारद ने खिसियाते हुए कहा – “ लयो एक तो बिना मेहनत करे ही बोहनी हो गई तुम्हारी । ऊपर से कह रही हो कि पाप करवा दिया हमसे । ”
नारद ने उसकी टोकरी में से एक बैंगन निकाला और कहा – “ ये देखो सड़ा हुआ बैंगन है , न जाने कितनी इल्ली निकलेंगी इसमें और इसी बैंगन को तुम बाजार में अच्छा बैंगन बताकर बेचोगी । ये पाप नहीं है ? चलो निकालो हमारा हिस्सा । ”
कुछ देर पहले अम्मा की सब्जियों की प्रशंसा करने वाले नारद ने पलटा खा लिया था । क्योंकि तब उसे पैसे दिलाने थे और अब लेने थे ।
बूढ़ी अम्मा ने एक सिक्का नारद के हाथ में थमाया । नारद ने सिक्के को ध्यान से देखा और कहा – “ चवन्नी ? अरे ! मैंने अठन्नी माँगी थी । ”
अम्मा ने कहा – “ माँग़ने से क्या हमें पश्चाताप भी तो करना है । हम एक रूपया अपने पास रखेंगे और बाकि मंदिर में चढ़ा देंगे । ”
नारद ने कहा – “ अरे ! लेकिन........”
पर अबकि अम्मा ने उसकी एक न सुनी और आगे बढ़ गईं ।
“ हा हा हा.........” – एक अट्टहास का स्वर नारद को सुनाई दिया । नारद पलटा तो उसने देखा कि ये अट्टहास शोभित का था ।
नारद ने कहा – “ अरे ! शोभित आ गए अखबार बाँटकर.......इतना जोर से क्यूँ हँसे भाई ? ”
शोभित ने कहा – “ हँसू न तो क्या करूँ भैय्या । आपने इतनी मेहनत की और मिले केवल 25 पैसे । इन 25 पैसे से क्या होगा जो आपने हवा – हवा में 3 टमाटर नाली में बता दिए । ”
नारद ने कहा – “ धार मिलती है शोभित धार । देखो मेरा काम है चुनाव प्रचार का । अब प्रचार के लिए हर तरह के काम करने पड़ते हैं । सबसे कठिन काम होता है वोटरों के दिमाग में अपनी बात फ़िट करना । उन्हें शतरंज के मोहरों की तरह चलाना । विधानसभा चुनाव हुए दो साल बीत गए । वो पैसे खत्म होने लगे हैं । इसलिए ये 25 पैसे भी काम के हैं । इनसे एक पेंसिल तो आ ही जाएगी बच्चे की । साथ ही मैं अपने को अजमा रहा था कि आज भी लोगों की सोच को अपने अनुसार बदल सकता हूँ कि नहीं ? क्योंकि कुल मिलाकर यही कला तो है मेरे पास जिसके भरोसे कमाता हूँ । अब देखो अभी भी उस साईकिल वाले से पैसे निकलवा लिए न । बुढ़िया के दिमाग में भी ये बात डाल दी कि उसके तीन टमाटर नाली में गए हैं । फिर ये भी घुसा दिया कि एक भी टमाटर नाली में नहीं गया है और इसका कमीशन भी खा लिया और तो और भगवान को भी 50 पैसे का चढ़ावा हो गया । मैंने एक साईकिल वाले को दुखी करके दो इंसानों और एक भगवान को खुश कर दिया । वास्तव में मुझ जैसे इंसानों के कारण ही दुनिया में अच्छाई बची हुई है । ”
शोभित बोला – “ क्या नारद भैय्या आप भी । वैसे आप किसी को भी बरगलाने की ताकत रखते हैं । ऐंवे ही तीन टमाटर नाली में पहुँचा दिए । ”
नारद ने कहा – “ वैसे पूरा काम हवा में नहीं किया । एक टमाटर तो वास्तव में नाली में गया था । ”
शोभित ने कहा – “ क्या भैय्या अब आप मुझे भी चलाने लगे । ”
नारद ने कहा –“अरे ! नहीं यार , एक टमाटर वास्तव में नाली में गया था । चाहों तो हाथ डालकर देख लो । साँच को आँच कहाँ । ”
लेखक
प्रांजल सक्सेना 
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